Hindi kavita
अति सदा वर्जयेत
प्यार प्रेमका मधुर ये बंधन सब संसारको बांधे
अतिप्रेमके पाशमे परवश मोहमे बदल ये जाये
प्रेम ये थापट मारके बोले, अति अतिको त्याग रे मानव
अति अतिको त्याग———
यम आहार विहार व निद्रा कृष्ण गांव ले जाये
अतिकी आगमे लीपट लीपटकर अपने आप जलाये
समता थापट मारके बोले अति अतिको त्याग रे मानव
अति अतिको त्याग———-
कर्म क्रिया जो जीवन चक्कर सहज भाव चलाये
अतिकर्म जो अनजानेमे फलको विफल बनाये
केशव थापट मारके बोले अति अतिको त्याग रे मानव
अति अतिको त्याग———-
सरयू परीख्
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बेबसका सहारा
बहेन मै तो पराये अपने समज आई
दिलमे आशा अरमान भरी लाई
स्नेह तांतणे भरोसे थमे चलदी
मेरी सेंथीमे सिंदूर भरी म्हाली
वो मध्यबिंदु मेरे छोटेसे विश्वमे
उसका आवास अंतर विश्वासमे
बना हेतु वो मेरे श्वासौच्छ्वासमे
छुपा आज वो आक्रंद निश्वासमे
तुटा नाजुक वो दोर मजधारे
बहोत सांधा संसार प्रेमतारे
झटकेसे तोड मुजे छोडा नोधार
ऐकली अटुली मै किसके आधार्!
भले नयन रुए अणधारी आंचसे
जले आत्मदीप शकतिके साथमे
शर्त ढुंढुंगी खोइ हुइ आपको
सखी! तेरे ये स्मितके सहारे
सखी! तेरे ये स्मितके सहारे
सरयु परीख
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कर्म का मर्म
कर्म का मर्म, मर्म से धर्म, धर्मसे नीति में समजी
कर्म अकर्म विकर्मके संगमे सुकर्मकी रीति में समजी
रोज रोजकी रटमें यदी में शुध्ध भावभर राचुं
कामकाज और फर्ज-कर्जमे कर सकुं में साचुं
सत संसारमें जीते जीते संतकी पदवी पामुं
सुखचैनमे रहते हुए भी जनकराज कहेलावुं
यम नियमके दस साधन में मातपितासे सीखुं
समभाव समतोलन भक्ति गुरु कृपासे पावुं
श्यामकी गीता दीपक मेरा घन अंधार हटाये
राम और सीता हाथ थाम कर सरयू पार कराये
सरयू परीख्
ये कविता “गीता प्रवचनो–विनोबा भावे” पढ्नेके बाद–-
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प्रार्थना
प्रभु मेरी आशा नहिवत करना
प्रभु मेरी अपेक्षा निर्मूल करना
परणी में सासरमे आई, नये बंधनो बांधी
सबकी सेवा करते करते, एक प्रार्थना चलती–प्रभु
बाल गोपल गोदी मे खेले, सर्व अर्पण पालनमे
पढलिख कर जब चल दिये तब, वोहि प्रार्थना चलती–प्रभु
बेटी मेरी कब ब्याहेगी, मन उमंगमे राचे
बनके पराई बिदा हुई तब , वोहि प्रार्थना चलती–प्रभु
रूमजुम पायल घरमे आयी, पुत्रवधू ये प्यारी
मन चाहे दो मधूर बचन तो, वोहि प्रार्थना चलती–प्रभु
सुखी करके सुखी होनेकी, एक अमूल ये चाबी
जरीतरी नहीं कोई अपेक्षा, ‘सरयू’ संसारीकी–प्रभु
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ऍसी अधि आतमकी गति, सतसंगी
ऍसी अधिआतमकी गति——
आजतक जाना संसार मेरा सवॅस्व
कितने जतनसे जमाया था वचॅस्व
साधन अब उसको बनाउं, रे साधु
ऍसी अधि आतमकी गति——
सुंदर मुझ आवरण सजाया सवौत्तम
आत्माका मंदिर बसते हे पुरुषोत्तम
अक्षर ये क्षरमे समाया, रे साक्षर
ऍसी अधि आतमकी गति——
कभी तमस मंद कभी रजस सत्व तिव्रत्तम
शरीर मन बुध्धिकी पगथीपे उतरचड
उगम आग मूलाधार लागी, रे गुरुजी
ऍसी अधि आतमकी गति——


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